Wednesday, September 8, 2010

विरही की गाथा

जीवन में निविड़ सा एकाकीपन
खलता है उस पथ जहाँ प्रिये
तुम छोड़ गई हो साथ मेरा
अब छूटा हुआ है हाथ मेरा

तुम तारकदल के साथ चली
तो मुझे भी दे गई निशा भली
मैं तुमको ढूंढूं आसमान में
तुम मुझे ढूंढ नहीं सकती
पर मुझे रजनी भली लगती
क्योंकि ये दिवा तुम बिन तपती

जो साक्ष्य बनी थी अग्नि कभी
मेरी तुम्हारी सप्तपदी की
वो अब भी साक्ष्य स्वयं ही है
जो मुझे जलाती रहती है
जब जल- जल कर जब तप- तप कर
मैं भी रह जाऊंगा रज कण
तब तुमसे मिलने आऊँगा
तुम मेरी प्रतीक्षा वहीँ करना
जहां गई छोड़ कर साथ मेरा
जब आऊँ पकड़ना हाथ मेरा

जीवन में निविड़ सा एकाकीपन
खलता है उस पथ जहाँ प्रिये
तुम छोड़ गई हो साथ मेरा
अब छूटा हुआ है हाथ मेरा ।

सच

सच तो है मृत्यु भी सच तो है जीवन भी
सच तो है राम भी सच तो है किशन भी
अपनी अपनी श्रद्धा है कृष्ण को माने या राम को
जाना तो सबको ही है मौत के ही धाम को

Tuesday, September 7, 2010

गरीब

सब अपने- अपने चहरे हैं,
सब जाने हैं, पहचाने हैं
किसने छीना किसने खाया
इस से सब ही अनजाने हैं
क्या किस्मत है क्या नियति है
सब जग का गोरख धंधा है
नेताओं के हमाम में
बस 'आम' है जो नंगा है

Monday, September 6, 2010

इन नयनों से

इन नयनों से तुम नेह निमंत्रण मत पहुँचाओ
देख रही है दुनिया हमको प्रेम छिपाओ
इन नयनों से

मुझे बुलाने से पहले तुम निशा निमंत्रित तो कर लो
सूनी रजनी का शोर जरा आँखों में भर लो
देने को उपहार हमें कुछ मोती तो छलकाओ
इन नयनों से

नित्य बुलाना नित आऊँगी छत पर मिलने
मौन रहो तुम ज़रा अभी दो सूरज ढलने
दे स्पर्श मुझे अभी तुम मत भरमाओ
इन नयनों से

मधुर निशा की मधुर चाँदनी मधुरामृत भरा मन
ही लाओगे होता जबकि विष सा जीवन
संगम का नहीं जल सागर का भर लाओ
इन नयनों से

सत्य

जो तुमसे अजब सा नाता है
सबसे ये कहाँ निभ पाता है
जो तुमसे अजब सा नाता है

हम जलते- जलते रहते हैं
जब भी इसमें कोइ आता है
जो तुमसे अजब सा नाता है

तुम जान भले लो जुदा मत होना
हर दर्द सहा नहीं जाता है
जो तुमसे अजब सा नाता है

जो तुमसे अजब सा नाता है
सबसे ये कहाँ निभ पाता है
जो तुमसे अजब सा नाता है ।

हालात

अब हो गए हैं मेरे हालात कैसे- कैसे
तुमसे मिलकर हुए हैं जज्बात कैसे- कैसे

जिस रात तुम्हें देखा मेरा चाँद हुआ रौशन
मैंने गुजारी है वो अपनी रात कैसे- कैसे

फूलों ने कहा तुमसे मैं खुश्बू हूँ तुम्हारी
तुम तक पहुँच रही है मेरी बात कैसे- कैसे

मैं देखूं जहाँ तक भी मुझे तुम नज़र आते हो
मेरी तुमसे हो रही है मुलाक़ात कैसे- कैसे

तेरी आँखें मुझे ढूंढें, तेरे लब पुकारते हैं
मेरे दिल पे पड़े तेरे निशानात कैसे- कैसे
अब हो गए हैं मेरे हालात कैसे- कैसे
तुमसे मिलकर हुए हैं जज्बात कैसे- कैसे

Friday, September 3, 2010

कोई

कोई तो है जो निगाहों काम लेता है
सहर के बुझते चरागों से काम लेता है
मेरी गिरती हुई पलकों के सहारे के लिए
मेरी पलकें अपनी पलकों से थाम लेता है
मैं जहां भी रहूँ मुझको बुलाने के लिए
किसी बहाने से रब का वो नाम लेता है
कोई तो है जो निगाहों काम लेता है ।