Monday, July 8, 2013

रूद्र का प्रचण्ड अवतार।

बदहाली पर 'केदार' की
खुशहाल हुआ केदार,
माँ लौटी, लौटे पिता
देख प्रचण्ड अवतार रूद्र का
देख प्रचण्ड अवतार।

खुशहाली पर 'केदार' की
बेहाल हुआ करतार,
न पत्नी लौटी न बच्चा
उजड़ गया संसार ,

देख प्रचण्ड अवतार रूद्र का
देख प्रचण्ड अवतार।


मानो शिव ने खोल जटा
गंगा पृथ्वी पे बुलाई हो,
कभी न देखा इतने प्राणी लील
नदी हर्षाई हो।

पर आवेग देख तरणी का
ग्राम सभी जो विलुप्त हुए,
कोई जान सका न नदी में
कितने प्राणी सुप्त हुए।

बस जायगा फिर 'केदार'
धाम वहीं बन जाएगा,
फिर पूजा जाएगा शिव को
फिर मजमा लग जाएगा

पर करतार का पत्नी बच्चा
कभी न वापस आयेगा,
क्या करतार उन्हें लेने
'केदार' कभी फिर जाएगा


फिर खुशहाली पर 'केदार' की
बेहाल हुआ करतार,
न पत्नी लौटी न बच्चा
उजड़ गया संसार ,

देख प्रचण्ड अवतार रूद्र का
देख प्रचण्ड अवतार।


Friday, February 24, 2012

ख्वाहिश

यूं लगूं मैं तुम्हारे सीने से 
दिल मेरा बेक़रार हो जाए 

अब तक होंठों ने जो कहा नहीं कुछ 
आज होंठों की हार हो जाए 

खुद से मेरा भरोसा टूटे तो 
तुमपे बस ऐतबार हो जाए 

मसला मैंने जिसे कलियों की तरह 
दिल में फिर वो ही प्यार हो जाये 

रातें मेरी हों रातों की रानी 
दिन हर मेरा बहार हो जाए 

तुमसे मिलने की एक ही ख्वाहिश 
तुमसे मिलकर हजार हो जाए 

यूं लगूं मैं तुम्हारे सीने से 
दिल मेरा बेक़रार हो जाए 

Wednesday, December 7, 2011

तेरा जाना

खो गया मेरा अपना उसको कहाँ से लाऊँ
कहाँ- कहाँ पुकारूं और मैं कहाँ जाऊं

दर- दर जगह- जगह में तुम याद बन बसे हो
हर चीज़ में छुपे हो हर आस में सजे हो
क्या मिन्नतें करूँ कि तुमको मैं फिर से पाऊँ
कहाँ- कहाँ पुकारूं और मैं कहाँ जाऊं

हर पल में तुमको चाहा हर पल में तुम बसे थे
दिल को भी छू के देखा धड़कन में तुम सजे थे
जो तुमसे थी धड़कती धड़कन वो क्या सुनाऊँ
कहाँ- कहाँ पुकारूं और मैं कहाँ जाऊं

मैं खत्म करूँ कैसे किस्सा जो बन गया है
मेरी जिंदगी का आकर हिस्सा जो बन गया है
किस- किस को मैं सुनाऊँ ये हाल क्या बताऊँ
कहाँ- कहाँ पुकारूं और मैं कहाँ जाऊं

मैं चीख के कहती हूँ मेरा सब तो खो गया है
मेरी आँख से जो गिरते कौन आंसू बो गया है
जो बोझ अब है दिल पे पलकों पे मैं उठाऊँ
कहाँ- कहाँ पुकारूं और मैं कहाँ जाऊं

मन इतना भर गया है खाली न हो रहा है 
है तू नहीं लेकिन ये तेरी  याद संजो रहा है
रब करे ये तुझको हरदम तेरी याद से मैं पाऊँ
कहाँ- कहाँ पुकारूं और मैं कहाँ जाऊं
खो गया मेरा अपना उसको कहाँ से लाऊँ



Tuesday, October 18, 2011

जांच-पड़ताल

पलक अलक का कैसा मायाजाल है?

पुष्प गुच्छ सी अलक गिराती
झप-झप, झप-झप पलक झुकाती
ह्रदय की मन में धड़क-धड़क धक् उछाल है. 


उलझे रेशम फैले स्कंधों पर गिरकर
ताने-बाने बिने नयन पर जैसे बुनकर
शब्दों से गोरे मुख की क्या पड़ताल है?

जांच सको तो उड़ें जो अलकें पकड़ो उनको
फिर न गिर सकें नयन नयन से जकड़ो उनको
फिर देखो कि प्रेम का कैसा उबाल है.   

Friday, August 19, 2011

बड़ा मुश्किल है

बड़ा मुश्किल है सब सह पाना
जो दिल के दर्द हैं कह पाना

जब तेरे बिना मजबूर हों हम
दुनिया में कहीं भी रहने को
तब तेरे बिना रह पाना
बड़ा मुश्किल है सब सह पाना

जो बिखरी मेरे अश्कों से हो
दुनिया भर की पुरवाई में
तेरी यादों को दिल में तह पाना
बड़ा मुश्किल है सब सह पाना

Monday, August 8, 2011

आज़ादी

किस आज़ादी की बात करते हैं हम? आज़ाद देश कहाँ जा रहा है किसी को फिकर है? तकरीबन ग्यारहवीं शताब्दी से भारत गुलाम था जिस पर इंग्लिश शासन ने सोलहवीं शताब्दी में अपनी नज़र डाली और उन्नीसवीं सदी तक इसे पूरी तरह अपनी चपेट में ले लिया जिससे भारत को १५ अगस्त १९४७ को स्वतंत्रता भी मिल गई पर इस बीच कहाँ है नारी समाज जो आज भी स्वतंत्र है इसमें शक है। स्त्रियों को अपनी सोच के अनुसार न चलने देना, उनकी पढाई पर अभी भी परिवार वालों द्वारा रोक, बेटी को गर्भ में ही मार डालना और येन केन प्रकारेण यदि पैदा हो जाये तो पैदा होते ही उसे मार डालना, भाइयों से भेदभाव सहन करना अभी भी बहुत जगहों पर स्त्री जाति की मजबूरी है। अलग-अलग जगहों पर स्त्रियाँ अलग-अलग प्रकार से पुरुषों द्वारा और सच कहूँ तो स्त्रियों द्वारा भी शोषण का शिकार बनती हैं। स्त्रियों का खुद से बेहतर होना पुरुष वर्ग अपनी तौहीन मानता है जिसके लिए उन्हें किसी न किसी बहाने से नीचा दिखाने की कोशिश करता है यह न तो एक स्वस्थ मानसिकता है न ही स्वतंत्र। फिर भी भारत आज़ाद है तो बधाई है इस आज़ादी की। जिस आज़ादी के लिए स्त्रियों ने भी पुरुषों के कंधे से कन्धा मिलाया भले उनकी संख्या कम रही हो बधाई है इस आज़ादी की।

Tuesday, May 31, 2011

शाम

शाम उठती है शाम आती है
रातों में छम-छम शाम चलती है
दिन में सोती है दिन गुजरता है
शाम उठती है शाम आती है

शाम गुलाबी है शाम शराबी है
यौवन ही शाम की खराबी है
चाँद आके जो दस्तक देता है
शाम उठती है शाम आती है

शाम रंगीन है शाम तस्कीन है
सबकी दुआओं में शाम आमीन है
महफ़िल का जब भी समां बंधता है
शाम उठती है शाम आती है